समाज के बारे में
इतिहास
पारोत्रा (परोथा) ब्राह्मण उत्पत्ति श्री पारोत्रा (परोथा) ब्राह्मण की उत्पत्ति – ब्राह्मण पंच धावड़ी व्यास पुरोहित ब्राह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि गोत्र सांद्रल, ये गुजरात में यज्ञ करने के लिए पाटन के राजा मूलसिंह जी ने विभिन्न क्षेत्रों से 1016 (बरबद से 105, चवन ऋषि आश्रम से 100, सुवरासे से 100, कुंकुकम से 200, काशी से 100, कुरुक्षेत्र से 132, नर्मदा तीर से 100, करमक से 179) बुलवाये, कुल 1016 गुजरात देश में आये। यज्ञ बाईस ग्राम में किया गया। यह बाईस ग्राम गोल गांव के पास स्थित है। यज्ञ के बाद राजा ने पंडितों को दान दिया। कुछ ने दान लेना स्वीकार किया, कुछ ने दान लेना स्वीकार नहीं किया। बाईस ग्राम क्षेत्र में बसने वाले गोरवाल बाविसा कहलाये। एक वर्ष अकाल के कारण कुछ परिवारों ने नर्मदा नदी को पार किया। कुछ वहीं बस गये, वे लोग बाविसा कहलाये तथा दूर जाने वाले पारोत्रा (परोथा) ब्राह्मण कहलाये। जागा – कृष्ण मुरारी पिता – श्री भेरूलाल ग्राम दूरावद वाले की पुस्तक से लिखा गया। पारोत्रा बाबीसा ब्राह्मण समाज की विशेषता रही है— वैदिक धर्म, यज्ञ एवं संस्कारों के प्रति निष्ठा शिक्षा, विद्या और नैतिक मूल्यों पर विशेष बल सामाजिक एकता, सहयोग और परस्पर सम्मान परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन आधुनिक युग में समाज के सदस्य शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, व्यवसाय, कृषि और तकनीकी क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसके बावजूद समाज ने अपनी वैदिक जड़ों, धार्मिक आस्थाओं और सांस्कृतिक मर्यादाओं को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने का मार्ग चुना है। आज पारोत्रा बाबीसा ब्राह्मण समाज केवल एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि परंपरा से प्राप्त मूल्यों और भविष्य की दिशा के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में विकसित हो रहा है—जहाँ संस्कार, शिक्षा और सेवा समाज के मूल आधार हैं।
वर्षों से हमारा समाज शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता आया है।
परंपराएं
- वैदिक परंपराओं का पालन और संरक्षण
- धार्मिक अनुष्ठानों और संस्कारों का आयोजन
- सामूहिक पर्व और उत्सवों का आयोजन
- शिक्षा और ज्ञान के प्रसार में योगदान
- सामाजिक समरसता और सद्भावना को बढ़ावा
मूल्य
धर्म
धार्मिक मूल्यों और सिद्धांतों का पालन
एकता
समाज में एकता और भाईचारे को बढ़ावा
सेवा
समाज सेवा और परोपकार की भावना
संस्कृति
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण